भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जज सुधीर परमार समेत पांच बरी
सीबीआई मामले को साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं जुटा पाई, अदालत ने कहा

सत्य खबर हरियाणा
Corruption Case: ईडी भ्रष्टाचार के एक मामले में जज सुधीर परमार और तीन बिल्डरों समेत पांच लोगों के खिलाफ आरोप साबित करने में विफल रही है। सीबीआई की विशेष अदालत ने चर्चित भ्रष्टाचार मामले में जज सुधीर परमार, उनके भतीजे अजय परमार और तीन बड़े बिल्डर्स एम3एम के मालिक रूप बंसल, आईआरईओ के वाइस चेयरमैन ललित गोयल और वाटिका लिमिटेड के मालिक अनिल भल्ला को डिस्चार्ज कर दिया है। अदालत ने कहा कि आरोप तय करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं।
मामले की शुरूआत तीन साल पहले अप्रैल 2023 में हुई थी, जब हरियाणा के राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने एफआईआर दर्ज की। इसमें आरोप लगाया गया कि जज सुधीर परमार ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए रियल एस्टेट कंपनियों से जुड़े लोगों को फायदा पहुंचाने के लिए संपर्क बनाए। जांच एजेंसी का कहना था कि जज और उनके परिवार से जुड़े लोगों ने उस समय 7 से 8 करोड़ रुपये की संपत्तियां खरीदीं, जब इन कंपनियों के खिलाफ जांच चल रही थी। एजेंसी ने यह भी दावा किया कि इन खरीदारी के लिए पर्याप्त वित्तीय स्रोत नहीं दिखाए गए।
ईडी की जांच और मनी लॉन्ड्रिंग केस
इस मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भी जांच की थी। ईडी ने पहले 2021 में ललित गोयल को मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ्तार किया था और जनवरी 2022 में अभियोजन शिकायत दर्ज की थी। ईडी के अनुसार, होमबायर्स के करीब 1777 करोड़ रुपये को विदेशों में डायवर्ट किए जाने का आरोप था। इसी दौरान कंपनियों की संपत्तियों की अटैचमेंट प्रक्रिया भी चल रही थी।
जमीन और डेवलपमेंट डील्स भी जांच के दायरे में
जांच के दौरान गुरुग्राम और भिवाड़ी में आईआरईओ और एम3एम के बीच कई बड़े जमीन सौदे और डेवलपमेंट एग्रीमेंट सामने आए। स्टेट विजिलेंस और एंटी करप्शन ब्यूरो के अनुसार, गुरुग्राम के सेक्टर 61 और 58 में जमीन से जुड़े समझौते हुए। भिवाड़ी (राजस्थान) में करीब 78 एकड़ जमीन पर विकास समझौते किए गए। एम3एम द्वारा आईआरईओ को 700 से 800 करोड़ रुपये दिए जाने की बात सामने आई। एजेंसी ने आरोप लगाया था कि इन सौदों को लेकर दबाव बनाया गया और फैसलों को प्रभावित करने की कोशिश की गई।
जानिए सुनवाई के दौरान अदालत में क्या हुआ
मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने कहा कि किसी भी आरोपी के खिलाफ रिश्वत का सीधा प्रमाण नहीं है। किसी प्रकार के अनुचित लाभ या प्रभाव का ठोस सबूत नहीं मिला। संपत्तियों की खरीद को अवैध साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज नहीं हैं। अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि उपलब्ध साक्ष्य आरोप तय करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। अदालत के इस फैसले के साथ ही फिलहाल इस मामले में सभी आरोपियों को राहत मिल गई है। विस्तृत आदेश अभी जारी होना बाकी है, जिसके बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया स्पष्ट होगी।
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